भारत में संघवाद और स्थानीय शासन: जमीनी स्तर पर सत्ता
परीक्षा की दृष्टि से मुख्य विषय
- 16वाँ वित्त आयोग (अनुच्छेद 280): केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय हस्तांतरण पर विचार करने वाला संवैधानिक निकाय।
- 73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन: पंचायतों और नगर पालिकाओं को संवैधानिक दर्जा देने वाले ऐतिहासिक अधिनियम।
- पाँचवीं और छठी अनुसूची: जनजातीय क्षेत्रों की प्रशासनिक स्वायत्तता सुरक्षित करने वाले प्रावधान।
ताजा घटनाक्रम: 16वें वित्त आयोग ने केंद्र-राज्यों के बीच राजकोषीय हस्तांतरण पर बैठकों को आगे बढ़ाया है।
कल्पना कीजिए कि एक संयुक्त परिवार में नई दिल्ली में बैठा मुखिया देश के सभी राज्यों की रसोई के लिए खुद सामान खरीदे। क्या यह व्यावहारिक है? बिल्कुल नहीं। नागालैंड के गाँव की जरूरतें मुंबई से अलग होती हैं। इसी बुनियादी अहसास के कारण भारत ने संघवाद को चुना, जहाँ सत्ता का बँटवारा केंद्र, राज्यों और स्थानीय निकायों के बीच होता है।
- वर्ष 1950: मजबूत केंद्र के साथ संघीय ढांचा स्थापित हुआ।
- वर्ष 1992: त्रिस्तरीय पंचायती राज और नगरीय निकायों को कानूनी रूप मिला।
- वर्ष 2026: 16वें वित्त आयोग का ध्यान वित्तीय हस्तांतरण और स्थानीय स्वायत्तता पर है।
अवधारणा विश्लेषण: राजकोषीय संघवाद
राजकोषीय संघवाद एक बड़े कॉर्पोरेट कार्यालय की तरह है जो क्षेत्रीय शाखाओं को बजट देता है। यदि केंद्र सारा राजस्व अपने पास रखे, तो स्थानीय निकाय काम नहीं कर पाएंगे। कर राजस्व का निष्पक्ष बँटवारा स्थानीय स्तर पर विकास सुनिश्चित करता है।
भारतीय संघवाद का भविष्य इस बात पर निर्भर है कि हम संवैधानिक मंशा को जमीन पर कितनी प्रभावी ढंग से उतारते हैं। स्थानीय निकायों को आत्मनिर्भर शासन के इंजन में बदलना ही मुख्य लक्ष्य है।