मुख्य परीक्षा विषय एवं महत्वपूर्ण अवधारणाएं
- असममित संघवाद (Asymmetric Federalism): एक ऐसी संवैधानिक व्यवस्था जिसमें विशिष्ट राज्यों या क्षेत्रों को उनकी अनूठी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान की रक्षा के लिए विशेष विधायी, प्रशासनिक या वित्तीय शक्तियां प्रदान की जाती हैं।
- पाँचवीं अनुसूची (अनुच्छेद 244(1)): एक विशेष संवैधानिक प्रशासनिक ढांचा जो भारत के निर्दिष्ट क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) की भूमि, रीति-रिवाजों और आर्थिक सुरक्षा का संरक्षण सुनिश्चित करता है।
कल की महत्वपूर्ण हलचल: 14 सितंबर, 2026 को 'वाजीराम एंड रवि' (Vajiram & Ravi) द्वारा प्रस्तुत एक व्यापक संवैधानिक विश्लेषण में भारतीय संविधान की पाँचवीं अनुसूची (5th Schedule) के व्यावहारिक ढांचे को रेखांकित किया गया। इस विश्लेषण में विस्तार से बताया गया कि कैसे यह अनुसूची वर्तमान में भारत के 10 राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों (Scheduled Areas) का प्रशासन संभालकर वहां के मूल निवासी जनजातीय हितों की रक्षा कर रही है।
विविधता और संघवाद का अनूठा संतुलन
भारत 1.4 अरब लोगों का घर है। यह देश किसी कठोर एकरूपता को स्वीकार नहीं करता। इसके विपरीत, यहाँ असममित संघवाद की लचीली व्यवस्था काम करती है। केंद्र सरकार मजबूत है; फिर भी संविधान स्थानीय स्वायत्तता को पर्याप्त स्थान देता है।
ऐतिहासिक रूप से, मूल संविधान में केवल आठ अनुसूचियां थीं। वर्तमान में, अनुच्छेद 368 के तहत संशोधनों के माध्यम से इनकी संख्या बारह हो चुकी है। इनमें से पाँचवीं अनुसूची दस राज्यों में एक विशेष प्रशासनिक तंत्र के रूप में कार्य करती है। ये राज्य हैं: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान। यह अनुसूची एक सुरक्षा कवच है। यह सुनिश्चित करती है कि तीव्र आर्थिक विकास स्वदेशी जनजातियों की पहचान को नष्ट न करे।
"राज्यपाल सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा यह निर्देश दे सकते हैं कि संसद या राज्य विधानमंडल का कोई विशेष अधिनियम किसी अनुसूचित क्षेत्र पर लागू नहीं होगा, या ऐसे अपवादों और संशोधनों के साथ लागू होगा जो वे निर्दिष्ट करें।" — पैराग्राफ 5(1), भारत के संविधान की पाँचवीं अनुसूची
"राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को दी जाने वाली वार्षिक रिपोर्ट को अनिवार्य बनाकर, संविधान एक सीधा संघीय उत्तरदायित्व (Federal Accountability) स्थापित करता है, जो राष्ट्रीय निरीक्षण के साथ राज्य-स्तरीय प्रशासन को संतुलित करता है।" — वाजीराम एंड रवि संवैधानिक विश्लेषण, 14 सितंबर, 2026
प्रशासन की जमीनी हकीकत: आपके लिए इसके क्या मायने हैं?
इस व्यवस्था को समझने के लिए, आइए नई दिल्ली के संसद भवन से दूर किसी अनुसूचित राज्य के स्थानीय प्रशासनिक कार्यालय में चलें। यहाँ अधिकतम बीस सदस्यों की एक बैठक हो रही है। इसे 'जनजाति सलाहकार परिषद' (TAC) कहा जाता है।
व्यावहारिक रूप से, इस परिषद के तीन-चौथाई सदस्य राज्य विधानसभा के अनुसूचित जनजाति प्रतिनिधि होते हैं। यह कानूनी व्यवस्था स्थानीय समुदायों को अपनी पैतृक भूमि के निर्णयों में सीधी आवाज देती है।
संवैधानिक संरक्षण की तुलना
| विशेषता | पाँचवीं अनुसूची | छठी अनुसूची |
|---|---|---|
| लागू क्षेत्र | मध्य और पश्चिमी भारत के 10 राज्य। | उत्तर-पूर्वी भारत के 4 राज्य (असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम)। |
| प्रशासनिक निकाय | जनजाति सलाहकार परिषद (TAC)। | स्वायत्त जिला परिषद (ADC)। |
| अधिकारों का स्तर | मुख्यतः सलाहकारी; राज्यपाल को विधायी वीटो प्राप्त है। | व्यापक विधायी, न्यायिक और वित्तीय शक्तियां। |
मुख्य बिंदु
- राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकार: पाँचवीं अनुसूची के तहत, राज्यपाल के पास असाधारण शक्तियां हैं। वे राज्य या केंद्र के कानूनों को रोकने या संशोधित करने में एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं।
- भूमि और संसाधनों का संरक्षण: खनन, वानिकी या बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में काम करने वाले पेशेवरों के लिए यह व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है। यहाँ सामान्य भूमि अधिग्रहण नियम जनजातीय सहमति के अधीन होते हैं। इससे स्वदेशी संसाधनों का शोषण रुकता है। पारंपरिक कानून कानूनी रूप से सुरक्षित रहते हैं।
भविष्य की राह
भविष्य की ओर देखें तो, पाँचवीं अनुसूची सहकारी संघवाद का एक मजबूत आधार है। राष्ट्रीय एकीकरण और स्थानीय स्वशासन में संतुलन बनाकर, यह व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि आर्थिक प्रगति स्वदेशी अधिकारों का सम्मान करे। यह इस बात का प्रमाण है कि देश की एकता वास्तव में उसकी स्थानीय विविधता के संरक्षण पर ही टिकी है।