🎯 Question #7Organisations & Institutions 📅 09 October 2026

नशा मुक्त भारत अभियान (NMBA) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. यह सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा संचालित एक प्रमुख मांग-न्यूनीकरण (demand-reduction) अभियान है। 2. यह अभियान विशेष रूप से भारत भर के उन चिन्हित प्राथमिकता वाले जिलों को लक्षित करता है जो मादक पदार्थों के सेवन की संवेदनशीलता से ग्रस्त हैं। 3. एनबीएमए (NMBA) का प्राथमिक अधिदेश सामुदायिक या शैक्षणिक संस्थानों को शामिल किए बिना पूरी तरह से न्यायिक कारावास और कठोर पुलिस गश्त पर निर्भर करता है। उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

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This question was curated from today's in-depth analytical breakdown: अगरतला से गुजरात: नशा विरोधी प्रवर्तन की नई दिशा

अगरतला से गुजरात: अंतर-राज्यीय नशा विरोधी प्रवर्तन की नई दिशा

स्थानीय थानों की सीमाओं से परे 3,000 किलोमीटर का पुलिस अभियान दंडात्मक कानूनी प्रावधानों और जन-जागरूकता का साझा ढांचा तैयार करता है।

परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रमुख संकल्पनाएं

  • अनुच्छेद 47 (राज्य के नीति निर्देशक तत्व): लोक स्वास्थ्य को प्राथमिक दायित्व मानते हुए औषधीय आवश्यकताओं को छोड़कर मादक पेयों और नशीले पदार्थों के उपभोग पर रोक लगाने का संवैधानिक निर्देश।
  • एनडीपीएस अधिनियम, 1985: मादक द्रव्य एवं मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, जो पुलिस और प्रवर्तन एजेंसियों को तलाशी, परिसंपत्ति जब्ती और कठोर दंडात्मक अभियोजन के अधिकार देता है।
  • नशा मुक्त भारत अभियान (NMBA): सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा संचालित देश के 372 प्राथमिकता वाले जिलों में मांग घटाने का केंद्रीय कार्यक्रम।

कल का घटनाक्रम

9 अक्टूबर, 2026 को त्रिपुरा पुलिस ने अगरतला से गुजरात तक 3,000 किलोमीटर लंबी अंतर-राज्यीय मोटरसाइकिल यात्रा शुरू की, जिसका उद्देश्य पूर्वोत्तर सीमाओं से लेकर पश्चिमी औद्योगिक गलियारों तक संगठित मादक पदार्थ नेटवर्क के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा तैयार करना है।

प्रणालीगत बदलाव: स्थिर नाकों से राष्ट्रीय घेराबंदी तक

तस्कर गिरोह सीमाओं से नहीं बंधते। वे आधुनिक लॉजिस्टिक्स कंपनियों की भांति काम करते हैं; इसके विपरीत, पारंपरिक पुलिसिंग जिला सीमाओं और कानूनी अधिकार क्षेत्रों में बंटी रही। इस संरचनात्मक खाई का लाभ तस्कर उठाते रहे।

अगरतला से गुजरात तक की यह 3,000 किमी की यात्रा इसी जड़ता पर चोट करती है। विभिन्न राज्यों के पुलिस बलों, विश्वविद्यालयों और स्वयंसेवी संगठनों को जोड़कर इस अभियान ने पारगमन गलियारों को एक ठोस सुरक्षा तंत्र में बदल दिया है। ज़मीनी स्तर पर सूचनाओं का आदान-प्रदान अब कागजी औपचारिकताओं का मोहताज नहीं रहा।

ढांचागत परिवर्तन: पुराना बनाम नया मॉडल

प्रशासनिक पहलूपूर्व व्यवस्थावर्तमान रूपरेखाव्यावहारिक परिणाम
परिचालन क्षेत्रजिला स्तरीय नाके और स्थिर सीमा जांच चौकियां।अगरतला से गुजरात को जोड़ने वाला 3,000 किमी का साझा मार्ग।राज्यों के बीच जांच में लगने वाला समय घटा और त्वरित सूचना तंत्र बना।
वैधानिक दायराएनडीपीएस अधिनियम, 1985 के तहत केवल माल जब्ती तक सीमित कदम।आपूर्ति रोकथाम के साथ नशा मुक्त भारत अभियान का सीधा समन्वय।कठोर वैधानिक दंड और सामाजिक मांग-कटौती का दोहरा संतुलन।
नागरिक भागीदारीसरकारी दफ्तरों और थानों तक सीमित चेतावनी संदेश।मार्ग में स्थित 372 प्राथमिकता वाले जिलों के शैक्षणिक संस्थानों में सीधा संपर्क।सीमावर्ती और पारगमन क्षेत्रों के युवाओं को सक्रिय मुखबिर और सजग प्रहरी बनाना।
अंतर-राज्यीय तालमेलघटना होने के बाद औपचारिक विभागीय पत्राचार।पूर्वोत्तर और पश्चिमी राज्यों के पुलिसकर्मियों का सड़क स्तर पर सीधा संपर्क।अंतर-राज्यीय गिरोहों के विरुद्ध वास्तविक समय में कार्रवाई संभव हुई।

हितधारकों पर प्रभाव

राज्य पुलिस और केंद्रीय एजेंसियां अब समन्वित सूचना तंत्र से लैस हैं। एनडीपीएस अधिनियम, 1985 के तहत अंतर-राज्यीय जांच की गति तेज होती है, जिससे कानूनी लचरता पर लगाम कसी जा सकेगी।

छात्रों और युवा समूहों को सीधी जानकारी दी जा रही है। 3,000 किलोमीटर के इस पूरे रास्ते में युवाओं को लत के जैविक-मनोवैज्ञानिक खतरों और नशामुक्ति केंद्रों की कार्यप्रणाली समझाई जा रही है। सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक सतर्कता मजबूत होने से स्थानीय तस्कर नेटवर्क को पनाह मिलना कठिन हो जाता है।

आगे की राह और विश्लेषण

नशीले पदार्थों का संगठित व्यापार क्षेत्रीय नहीं, राष्ट्रीय समस्या है। इसका मुकाबला तभी संभव है जब सुरक्षा एजेंसियां अपनी रणनीतियों को जिलों की चारदीवारी से निकालकर पूरे आपूर्ति गलियारे पर केंद्रित करें। खंडित प्रयासों से सिंडिकेट्स का टूटना असंभव है।

संविधान का अनुच्छेद 47 केवल कागजी संकल्प नहीं रह सकता। उसकी सार्थकता तब सिद्ध होती है जब कठोर दंडात्मक कानूनों और जन-स्वास्थ्य कार्यक्रमों को एक साथ धरातल पर उतारा जाए। आपूर्ति की रोकथाम और मांग में कमी—दोनों मोर्चों पर एक साथ काम करके ही इस संकट का स्थायी समाधान तलाशा जा सकता है।

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