परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु एवं अवधारणाएँ
- शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत (अनुच्छेद 50): राज्य की शक्तियों का कानून निर्माण, क्रियान्वयन और न्याय के बीच विभाजन।
- नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली: यह सुनिश्चित करने वाले संवैधानिक तंत्र कि शासन का कोई अंग निरंकुश न हो।
- प्रत्यायोजित विधान: संसद द्वारा पारित मूल अधिनियम के दायरे में कार्यपालिका द्वारा बनाए जाने वाले उप-नियम।
10 अक्टूबर 2026 का घटनाक्रम
10 अक्टूबर 2026 को कानून एवं न्याय मंत्रालय ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संस्थागत सीमाओं को स्पष्ट करने वाले सांविधिक दिशा-निर्देश अधिसूचित किए हैं।
क्या आपने कभी सोचा है...?
क्या आपने कभी विचार किया है कि लोक सभा में 543 सांसदों द्वारा पारित कानून को सर्वोच्च न्यायालय के 5 न्यायाधीशों की पीठ रद्द कैसे कर सकती है?
यदि संसद जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है, तो न्यायपालिका को उस पर रोक लगाने का अधिकार किसने दिया?
भारतीय शासन व्यवस्था की गहराई
एक राजमार्ग परियोजना का उदाहरण लीजिए जहाँ नियम बनाने, सड़क बनाने और विवाद सुलझागाने वाले अलग होने चाहिए। भारत का संविधान शासन के 3 स्वतंत्र स्तंभ स्थापित करता है:
- विधायिका: कानून निर्मित करती है।
- कार्यपालिका: नीतियों को धरातल पर लागू करती है।
- न्यायपालिका: मूल अधिकारों की रक्षा करती है।
10 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार ने प्रशासनिक नियमों में पारदर्शिता लाने के लिए संशोधित नियमावली जारी की। भारत में अमेरिका जैसी कठोर व्यवस्था नहीं है, बल्कि नियंत्रण और संतुलन से युक्त प्रणाली है:
- संसद प्रश्नकाल के माध्यम से कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है।
- कार्यपालिका न्यायाधीशों की नियुक्ति करती है, परंतु हटाने के लिए अनुच्छेद 124(4) के तहत महाभियोग आवश्यक है।
- न्यायपालिका न्यायिक पुनरावलोकन (अनुच्छेद 13, 32, 226) का उपयोग करती है।
आगे का परिदृश्य
- राज्य स्तर पर क्रियान्वयन: सभी 28 राज्यों को 90 दिनों के भीतर विभागीय नियमों को अनुकूल बनाना होगा।
- न्यायिक समीक्षा: अनुच्छेद 13 के तहत सर्वोच्च न्यायालय इन नियमों की समीक्षा कर सकता है।
- संसदीय निगरानी: अधीनस्थ विधान संबंधी समिति इन अधिसूचनाओं की समीक्षा करेगी।